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Saturday, February 10, 2018

सीलिंगः ये पट्टी जख्म ठीक नहीं बल्कि जख्म बढ़ा रही है

- सीलिंग का आंखो देखा हाल

अक्सर जब भी चोट लगती है तो डॉक्टर चोट के हिस्से पर बहते हुए खून को रोकने के लिए डिटॉल लगाकर लगाकर खून को रोक देता है। और मरहम लगाकर पट्टी कर देता है। ताकि चोट जल्दी ठीक हो जाए। लेकिन दिल्ली में यह मरहम वाली पट्टी चोट को ठीक करने की बजाय घांव बढ़ा रही है।
यह घांव व्यापारियों के दुकानों की सीलिंग की वजह से बढ़ रहे हैं। जो वर्षो से अपनी दुकान चला रहे थे। व्यापारी सीलिंग के डर से पहले ही खौफ में थे, लेकिन अचानक सीलिंग का दस्ता आकर उनकी भी दुकानें सील कर रहा है। और दुकान के दरवाजे पर लगे ताले पर इस तरह से पट्टी कर रहा है जैसे डॉक्टर गंभीर जख्म के बाद जख्म को पट्टी पर लगे मरहम से ढकने की कोशिश करता है। चोट पर पट्टी इसलिए ज्यादा लगाई जाती है ताकि चोट जल्द ठीक हो सके। लेकिन निगम का सीलिंग दस्ता ताले पर पट्टी इसलिए ज्यादा लगा रहा है ताकि व्यापारी पर सीलिंग का जख्म ज्यादा दिन तक रहे। कई जगह इस पट्टी को लगाने के लिए कील भी ठोंकी जा रही है तकि उस रस्सी बांध कर इसे लगाया जा सके। क्योंकि दशक भी बीत जाए तो पट्टी न गले भले ही दरवाजा गल जाए। निगम द्वारा पट्टीलगाने के बाद लाल रंग की प्लास्टिक को मोमबत्ती से लौ (आग) से पिघलाकर उसे पीतल की बनी निगम की मोहर से ऐसे चिपकाया जाता है । यह उसी तरह होता है जैसे कोई गहरे जख्म में गर्म सुंआ छुआ (टच) कर रहा हो।
इस दुकान से मालिक पने परिवार के साथ अपने उस छोटू या मोटू का भी परिवार चला रहे थे जो उनके यहां पहले कभी साफ सफाई के लिए आता था। अब छोटू और मोटू बढ़े हो गए हैैं तो वह सफाई के साथ ग्राहकों को पानी भी पिला देते हैैं और मालिक के लिए दिन में खाना का भी इंतजाम कर देते हैैं। लेकिन दुकान सील होने से मालिक सड़क पर आ गए हैैं तो अब छोटू और मोटू को कौन पूछेगा ! छोटू और मोटू के परिवार वाले भी पूछ रहे है कि बिटवा दुकान पर काहे नहीं जा रहा हैं। बिटवा क्या करें और क्या कहे बस यही कह सकता है कि निगम वालों ने उसके मालिक की दुकान सील कर दी है। उसे नहीं पता की सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है। उसके मन में यही सवाल है कि जब मालिक गलत दुकान चला रहा था तो उसी समय क्यों नहीं दुकान बंद करवाई गई। अब जब दुकान से कई परिवार चल रहे हैैं तो इस मौके पर आकर दुकान क्यों बंद कर दी। जब तो निगम वाले भी दुकान पर आकर  चाय भी पीकर जाते थे और पुलिस वाला भी अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों को अपने नाम का हवाला देकर शॉपिंग करने की हिदायत देता था और मालिक को फोन करके सस्ते दाम पर वस्तुएं देने का आदेश देता था। पर अब वहीं पुलिस वाला निगम वालों को खड़े होकर बता रहा है कि यह दुकान भी नियमों के खिलाफ बनी है। पुलिस वाला अब मालिक से तो आंखे मिलाना छोडिए वह उस छोटू और मोटू की तरफ से भी शर्म से नहीं देख पा रहा है जो उसे पानी और चाय लाकर देते थे और फिर से झूटे बर्तन उठाकर ले जाते थे।

Tuesday, August 30, 2016

जब पत्रकारों को मिली शबाशी के बदले मौत

भारत में पत्रकारिता करना नहीं है आसान, ये दो बीट्स हैं सबसे खतरनाक
भारत उन पत्रकारों की मदद करने और उनकी रक्षा करने में विफल रहा है जो हिंसक धमकियों या फिर अपने काम के प्रति हमलों का सामना कर रहे हैं। ये कहना है पत्रकारों की सुरक्षा पर नजर रखने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था का, जिसने सोमवार को अपनी एक रिपोर्ट जारी की है।
न्यूयार्क की संस्था ‘द कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (सीपीजे) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में दावा किया है कि उसने 1992 से भारत में पत्रकारों की हत्याओं के 27 मामलों का अध्ययन किया और उनमें से एक में भी किसी को सजा नहीं हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन 27 पत्रकारों में से 50% से ज्यादा पत्रकार भ्रष्टाचार संबंधी मामलों पर खबरें करते थे।
42 पन्नों की इस विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में रिपोर्टरों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा अभी भी नहीं मिल पाती है। सीपीजे ने अपनी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और राजनीति को दो ‘सबसे खतरनाक बीट’ बताया गया है।
सीपीजे ने कहा कि पिछले 10 साल में उसे सिर्फ एक ही ऐसा मामला मिला जिसमें एक पत्रकार की हत्या के मामले में एक संदिग्ध का अभियोजन हुआ और उस पर दर्ज हुए आरोप सिद्ध किए जा सके, लेकिन बाद में उसे भी अपील पर रिहा कर दिया गया। दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में रिपोटिर्ंग करने वालों पर हिंसा और धमकियों का ज्यादा जोखिम होता है।
किसी पत्रकार पर हमला होने या हत्या होने पर मीडिया क्षेत्र और समाज में अकसर बहुत रोष नहीं जताया जाता जो कि खेद का विषय है। समिति ने अपने नतीजों पर पहुंचने तथा सुझाव के लिए तीन पत्रकारों जगेन्द्र सिंह, उमेश राजपूत और अक्षय सिंह की मौतों के मामलों का अध्ययन किया जिसकी हाल ही में हत्या कर दी गई थी।
जगेन्द्र सिंह की उत्तर प्रदेश में हत्या कर दी गई थी जबकि उमेश राजपूत की छत्तीसगढ़ में हत्या कर दी गई थी वहीं अक्षय सिंह की मौत मध्य प्रदेश में हुई थी।
संसद पत्रकारों के लिए एक देशव्यापी सुरक्षा कानून बनाए रिपोर्ट में इस बात की भी पुरजोर वकालत की गई है।

Saturday, February 26, 2011

भ्रष्टाचार से भारत कैसे मुक्त हों ? पार्ट वन

देश में दिन प्रतिदिन भ्रष्टाचार  के नित नए मामले प्रकाश में आ रहे है | जिससे दुनिया में भारत की बहुत किरकरी हो रही है जिसके कारन देश की आन और शान पर खतरा मंडरा रहा है, अब बात ये की इस केंसर रुपी  बीमारी को कैसे दूर किया जाये इसको लेकर देश एक पहल की जरुरत है ..... इसके लिए अखिल भारतीय पत्रकार द्वारा आयोजित एक प्रतियोगता  आयोजित की गई थी जिसमे भ्रष्टाचार को भारत से दूर करने लिए पत्रकारिता के छात्रों द्वारा लेख हम आपके सामने कड़ी दर कड़ी आपके सामने पेश करेंगे ..  तो आज पेश है दिल्ली विशाविध्यालय में रामलाल आनंद कालेज से  पत्रकारिता का अध्यन कर रहे नितेश कुमार राय का लेख प्रस्तुत है....
भारत को भ्रष्टाचार पूरी तरह से जकड़ चुका है। चपरासी से लेकर बड़े-बड़े अधिकारी और नेता तक भ्रष्टाचार में लिप्त है। ऐसे में भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना कठिन कार्य है। भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए सर्वप्रथम देश के प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत दृढ़संकल्प लेना होगा कि वह न तो कभी भ्रष्टाचार करेगा और न ही भ्रष्टाचार को देखकर कभी चुप बैठेगा तब जाकर भारत को इस रोग से बचाया जा सकता है।
  भ्रष्टाचार से निबटने के लिए देश के नागरिको को शिक्षित करने के साथ-साथ उनके अधिकारों व कर्तव्यों की शिक्षा भी देनी होगी। आज भारतीयों के मानवीय मूल्यों और नैतिक मूल्यों में गिरावट आ गयी है जिसके कारण लोगों में भ्रष्टाचार करने की प्रवृति बढ़ गयी है। भ्रष्टाचार करने वाले लोगों की ज्वाबदेही सुनिश्चित की जाये तथा उन पर तुरंत कार्यवाही की जानी चाहिए। ऐसा कृत्य करने वालों के लिए नियम और कानून कठोर होने चाहिए कि वह कोई भी समाजविरोधी कार्य करने से पहले एक बार सोचने को मजबूर हो। ऐसे मामलों का निपटारा एक निश्चित समय में किया जाना चाहिए।
  सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को लोगों के लिए और भी आसान बनाया जाना चाहिए। आजकल इस अधिकार का उपयोग करने वाले लोगों को भ्रष्टाचारियों द्वारा जान-माल की धमकियाँ दी जा रही है। ऐसे में इस अधिकार का उपयोग करने वाले लोगों का नाम-पता गोपनीय रखने के लिए एक अलग विभाग की स्थापना की जानी चाहिए ताकि इस विभाग के माध्यम से लोग इस अधिकार का उपयोग भ्रष्टाचार को रोकने में कर सके।
  आज भारत में युवाओं की एक बहुत बड़ी फौज तैयार है।भ्रष्टाचार से भारत को मुक्त कराने में युवाओं के सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है। युवा ही देश का भविष्य है।क्योंकि आज का युवा ही कल का चपरासी से लेकर अधिकारी, नेता और प्रधानमंत्री बनेगा। ऐसे में जब तक इस कार्य को युवा अपनें हाथ में नही लेगा तब तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पाना नामुमकिन है।
 भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए सरकार को चाहिए कि आम नागरिकों, समाजसेवकों और बुद्धजीवियों को मिलाकर एक ऐसे संगठन का निर्माण करे जो भ्रष्टाचाार के खिलाफ निगरानी का कार्य करे। इस संगठन में किसी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप न हो। यह संगठन सिर्फ न्यायपालिका के प्रति ज्वाबदेह हो। इस संगठन का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ सामाजिक होना चाहिए। इस संगठन के पदाधिकारियों का चुनाव लोकतंात्रिक तरीके से हो। इस संगठन का सदस्य वह भारत का हर नागरिक हो सकता है जो भ्रष्टाचार से लड़ने में देश की सेवा निः स्वार्थ भाव से करना चाहता हो। संगठन का कार्य भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना हो तथा उसकी शिकायत सीधे न्यायपालिका को करना चाहिए। ऐसे शिकायतों को फास्ट ट्रैक अदालतों के जरिए तुरंत निबटाना चाहिए।
      अतः भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के लिए देशवाशियों को स्वयं दृढ़संकल्प लेकर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना होगा।