Wednesday, July 10, 2013

विश्व जनसंख्या दिवस पर विशेष : जनसंख्या नियत्रण पर फेल है लाल फीताशाही

विशेष रिपोर्ट : निहाल सिंह
नई दिल्ली, 10 जुलाई  मनुष्य को छोड़कर दूसरे किसी भी प्रजाति के जीवों की आबादी को नियंत्रित करने की जरुरत नहीं होती है। उनकी आबादी को प्रकृति खूद नियंत्रित रखती है,लेकिन मानव जैसे-जैसे विकास की सीढ़िया फर्लांगते जा रहा है और असाध्य बीमारियों पर काबू पाते जा रहा है वैसे-वैसे आबादी भी बढ़ते जा रही है। एक दौर था जब किसी महामारी का प्रकोप होता था तो गांव-गांव की आबादी लुप्त हो जाती थी। एक तरह से मानव की तरक्की ही प्रकृति के संतुलन पर भारी पड़ रहा है। चीन ने अपने यहां सख्त कानून बनाकर काफी हद तक अपनी आबादी को काबू कर रखा है,लेकिन भारत के संदर्भ में जब बात विश्व जनसंख्या की आती है तो दिन दोगुना रात चौगुनी की कहावत भी कम पड़ जाती है। आज विश्व जनसंख्या का विस्फोट इस तरह दुनिया पर भारी पड़ रहा है,जिसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
प्रति मिनट 25 बच्चे होते हैं पैदा
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) की वरिष्ठ गायनिकोलॉजिस्ट डॉ अलका कृपलानी कहती हैं कि आपको जानकर यह आश्चर्य होगा कि अकेले भारत में प्रति मिनट 25 बच्चे पैदा होते हैं। यह आंकड़ा वह है जो बच्चे अस्पतालों में जन्म लेते हैं। अभी इसमें गांवों और कस्बों के घरों में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या नहीं जुड़ी है। जबकि भारत मूल रुप से गांवों और कस्बों का ही देश है और वहां की महिलाओ की डिलीवरी घरों में ही होती है। अब सोच कर देखिए जब अकेले भारत में इतने बच्चे एक मिनट में पैदा होते होंगे तो विश्व में कितने बच्चे प्रति मिनट धरती पर आते होंगे। हम जनसंख्या तो बढ़ा रहे हैं,लेकिन संसाधनों को इस तरह खत्म कर रहे हैं कि हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए संसाधनों के खत्म होने का डर लगा हुआ है।
सरकारी कार्यक्रम फेल
हार्ट केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ केके अग्रवाल कहते हैं कि जागरु कता के नाम पर भारत में कई कार्यक्रम चलाए गए, हम दो हमारे दो का नारालगाया गया लेकिन लोग हम दो हमारे दोका बोर्ड तो दीवार पर लगा देख लेते हैं और घर जाकर उसे बिलकुल भूल जाते हैं और तीसरे की तैयारी में जुट जाते हैं। भारत में गरीबी, शिक्षा की कमी और बेरोजगारी ऐसे अहम कारक हैं जिनकी वजह से जनसंख्या का यह विस्फोट प्रतिदिन होता जा रहा है। कुछ खास समुदाय के लोग अपनी धार्मिक आस्था के चलते परिवार नियोजन से दूर रहना  चाहते हैं। ऐसे में देश में जिस गति से आबादी बढ़ रही है उस हिसाब से देश के संसाधनों पर सन 2026 तक न केवल 40 करोड़ और लोगों का दबाव बढ़ जाएगा, बल्कि  हम जनसंख्या के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ देंगे।
महिलाएं स्वैच्छिक परिवार नियोजन से दूर
गंगाराम अस्पताल की वरिष्ठ गायनिकोलॉजिस्ट डॉ आभा मजूमदार कहती हैं कि जागरुकता के बावजूद महिलाएं परिवार नियोजन के विकल्पों से दूर रह रही हैं। किसी की धार्मिक आस्था सामने आ रही है तो किसी की सामाजिक ताने। भारत समेत सभी विकासशील देशों में मां बनने की उम्र की 21 करोड़ 50 लाख महिलाएं स्वैच्छिक परिवार नियोजन तक पहुंच नहीं पाती हैं। लाखों किशोरों और नवयुवितयों को एचआइवी से बचाव की जानकारी बहुत कम है। सात अरब की आबादी में 1.8 अरब लोग ऐसे हैं, जिनकी उम्र 10 से 24 साल के बीच है। धरती पर इंसान की उत्पत्ति के कई हजारों साल बाद जनसंख्या ने एक अरब का आंकड़ा छुआ। दूसरे अरब का आंकड़ा छूने में उसे 120 साल से ज्यादा का इंतजार करना पड़ा। बीते पचास सालों में इंसानों की तादाद में दोगुना से ज्यादा की वृद्धि हुई। 1959 में तीन अरब थे तो 1984 में चार अरब हो गए। 1997 में पांच तो 1999 में छह अरब हो गए। सिलसिला जारी है। पृथ्वी की कुल आबादी इस समय 7 अरब से भी ज्यादा है। सन 2030 और 2040 के बीच विश्व की जनसंख्या के नौ अरब का आंकड़ा पार कर जाने की संभावना है। अगर जल्द ही वैश्विक तौर पर जनसंख्या नियंत्रण के अहम कदम ना उठाए गए तो इस बात का डर है कि जनसंख्या का विस्फोट संसाधनों को निगल जाए और हालात विश्व युद्ध के बन जाएं।


Saturday, June 8, 2013

फ्रैक्चर को न करें नजरअंदाज,बन सकता है जिंदगी भर का दर्द

निहाल सिंह ।
नई दिल्ली। युवा कामकाजी प्रोफेशनल 25 वर्षीय प्रिया कुकरेजा ने इस उम्र में अप्रत्याशित स्वास्थ्य समस्या के बारे में कभी नहीं सोचा था जब तक कि वह दुर्घटनावश बर्फ पर फिसल नहीं गई और उसकी कोहनी टूट नहीं गई। प्रिया ने इसे हल्के में लिया। शुरु में दर्द नहीं हुआ,लेकिन बाद में टूटी हड्डी की जगह सूजन आने से परेशानी बढ़ गई। जबतक वह आर्थोपेडिक डॉक्टर के पास गई तबतक नुकसान हो चुका था। उसके कोहनी में हड्डी गलत जगह से जुड़ने की वजह से उसके हाथ टेढ़े हो गए।
जब इस युवा महिला की जांच की गई तो एक्स-रे में हड्डी के कई टुकड़े के साथ जटिल फ्रैक्चर पाया गया। उसकी दाहिनी कोहनी में दर्द, सूजन भी थी और उसे हिलाना- डुलाना मुश्किल था। उसकी कोहनी का एक जटिल अपरेशन किया गया और हड्डी के टुकड़ों को विशेष  प्लेट और स्क्रू से फिक्स किया गया। इस प्रक्रिया के तीन महीने बाद, वह अब सामान्य रूप से अपने हाथ को हिलाने - डुलाने में सक्षम है। यदि समय रहते इलाज किया जाता तो प्रिया को इतना परेशान होने की जरुरत नहीं थी।
फ्रैक्चर को न लें हल्के में
फोर्टिस अस्पताल के आर्थोपेडिक विभाग के अध्यक्ष डॉ जीके अग्रवाल कहते हैं कि शरीर के किसी भी हिस्से में फ्रैक्चर होना ठीक नहीं है। यदि फ्रैक्चर हो भी गया है तो इसके सही इलाज की जरुरत है। यदि इसे नजरअंदाज किया जाएगा तो यह जीवन भर का दर्द बन सकता है। डॉ अग्रवाल के मुताबिक कोहनी ऊपरी अंग के सबसे महत्वपूर्ण भागों में से एक है और इसके फ्रैक्चर का सही ढंग से इलाज नहीं कराने पर यह काफी परेशानी पैदा कर सकता है। कोहनी में फ्रैक्चर के कारण उसे हिलाने-डुलाने में परेशानी और जकड़न जैसी जटिलताएं हो सकती हैं।
फ्रैक्चर का क्या है इलाज?
सफदरजंग स्पोर्ट्स इंज्यूरी सेंटर के निदेशक डॉ दीपक चौधरी कहते हैं कि यदि हड्डियों को ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा हो तो जल्द मूवमेंट पर बल दिया जाता है, या स्लिंग, कास्ट या स्प्लिंट जैसे सामान्य उपचार किए जाते हैं। विस्थापित या अस्थिर फ्रैक्चर होने पर क्षतिग्रस्त हड्डियों को फिर से संगठित करने और फिर निर्माण करने के लिए सर्जरी की आवश्यकता होती है।
हड्डियों को सही स्थिति में लाने के लिए किसी विशेषज्ञ के द्वारा सर्जरी कराना महत्वपूर्ण है। जोड़ों की हड्डियों को सही तरह से फिट किया जाना जरूरी है ताकि दुर्घटना के बाद हड्डियां जिग-सा पजल की तरह फिट नहीं हों, क्योंकि ऐसा होने की संभावना होती है। इस प्रक्रिया के बाद रोगी के सामान्य कामकाज करने की संभावना बढ़ जाती है।
डॉ चौधरी कहते हैं कि अस्टियोपोरोसिस से ग्रस्त महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग लोग खराब किस्म के फ्रैक्चर के प्रति विशेष रूप से संवदेनशील होते हैं,क्योंकि उनकी हड्डियां कमजोर होती हैं और उनके टूटने की भी आशंका अधिक होती है। हड्डी का फ्रैक्चर हमेशा इतना खतरनाक नहीं होता हैं, लेकिन स्थिति के खराब होने नहीं देने के लिए बहुत सावधान रहना चाहिए और उचित चिकित्सकीय सलाह और देखभाल लेना चाहिए ताकि स्थिति और बिगड़े नहीं। चोट लगने के बाद सतर्क रहना चाहिए और इलाज करने में विलंब नहीं करना चाहिए। इससे मरीज को दोबारा शीघ्र चलने-फिरने लायक बनने में आसानी होती है।

Thursday, May 30, 2013

एन्टी तंबाकू दिवस पर विशेष, दस में से पांच वयस्क घर पर अपरोक्ष धूम्रपान के शिकार


नई दिल्ली। निहाल सिंह ।। जब 65 वर्षीय सीमा को अपने फेफड़े के कैंसर के बारे में पता चला तो उनकी पूरी दुनिया बिखर गई। उनके लिए यह एक झटके के रूप में सामने आया खासकर तब जब कि वे धूम्रपान नहीं करती थी और एक स्वस्थ्य जीवन शैली का पालन कर रही थी। वह करीब 40 सालों से अपने पति के धूम्रपान की वजह से परोक्ष धूम्रपान का शिकार हो रही थी।
बिना किसी गलती के यह महिला दर्दनाक किमियोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी से गुजर रही हैं, लेकिन इस बिमारी के अंतिम चरण पर यह इलाज भी कोई बहुत ज्यादा प्रभावकारी नहीं होता है। आत्मग्लानि से ग्रस्त उनके पति ने धूम्रपान छोड़ दिया, लेकिन यह एहसास होने में बहुत देर लग गई। अगर उन्हें समय से यह एहसास हो जाता तो वे अपनी पत्नी को इस खतरनाक बीमारी से बचा लेते।
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट के वरिष्ट ओंकोलॉजिस्ट डॉ उल्लास बत्रा कहते हैं कि यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है, हम अक्सर ऐसे मामले देखते हैं, जो अक्सर अपरोक्ष धूम्रपान का परिणाम होते हैं। तंबाकू रहित दिवस मनाते हुए हमें न सिर्फ युवाओं को धुएं के खतरे से बचाना ही आवश्यक है, बल्कि इसे अगली पीढी में जाने से रोकना है।
क्या है अपरोक्ष धूम्रपान?
अपरोक्ष धूम्रपान तब होता है जब, किसी धूम्रपान कर रहे व्यक्ति के जलते उत्पाद या फिर छोडे गए धुएं को कोई धूम्रपान न करने वाला व्यक्ति अपने सांसों के जरिए अंदर लेता है। यह पाया गया है कि एक जलती हुई सिगरेट से निकलने वाले धुएं का 66 फीसदी धुम्रपान करने वाला स्वयं नहीं लेता, बल्कि वह पूरे वातावरण में फैल कर उसे धूम्रपान करने जितना ही खतरनाक बना देता है। अपरोक्ष धूम्रपान घातक होता है क्योंकि इसमें धूम्रपान करने वाले व्यक्ति द्वारा लिए गए निकोटीन तथा टार की दुगनी मात्रा होती है, इसमें कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा पांच गुना ज्यादा होती है, इसमें ज्यादा स्तर की अमोनिया एवं कैडमियम होती है, इसमें हाइड्रोजन साइनाइड, एक जहरीली गैस, होती है, इसमें नाईट्रोजन डाइऑक्साइड है जो बहुत नुकसानदायक है तथा नियमित रूप से अपरोक्ष धूम्रपान का शिकार होने पर फेफडे के रोगों की संभावना 25 फिसदी बढ जाती है तथा हृदय रोगों की संभावना 10 फिसदी बढ जाती है।
तंबाकू से छह लाख लोगों की जाती है जान
फोर्टिस अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. समीर पारीख दुनिया भर में तंबाकू की लत सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बडा खतरा बन चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह हर साल करीब छह लाख लोगों की जान लेती है जिसमें करीब पांच लाख वे होते हैं जो सीधे तंबाकू का सेवन करते हैं और करीब छह लाख ऐसे लोग होते हैं जो धूम्रपान नहीं करते हैं और अपरोक्ष धूम्रपान का शिकार होते हैं। डॉ पारीख कहते हैं कि इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि तंबाकू का प्रभाव अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग तरीके से पडता है। जो लोग तंबाकू के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं,उन्हें प्रत्यक्ष या परोक्ष धूम्रपान से जल्दी कैंसर हो सकता है और जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता थोडी ज्यादा होती है वे इसके प्रत्यक्ष परिणामों से थोडे लंबे समय के लिए बच सकते हैं। वास्तविक तथ्यों के अनुसार बडे लोगों की तुलना में युवा ज्यादा धूम्रपान करते हैं और जितनी जल्दी वे शुरु करते हैं, उसके दुष्भाव उतनी जल्दी शुरु होते हैं। डॉ पारीख के मुताबिक भारत में 35 प्रतिशत लोग तंबाकू सेवन करते हैं। इसमें 46 प्रतिशत ग्रामीण महिलाएं भी तंबाकू सेवन की लत से ग्रस्त हैं।
स्पर्म काउंट के कम होने का कारण है तंबाकू
सर गंगाराम अस्पताल की स्त्रीरोग विशेषज्ञ डॉ आभा मजूमदार कहती हैं कि पुरुषों में संतान पैदा न कर पाना कई कारकों पर निर्भर करता है, उनमें से सबसे बडा कारक तंबाकू है। महिलाओं में भी तंबाकू का सेवन बहुत अधिक बढ गया है, जिसकी वजह से लगातार बांझपन के मामले बढ रहे हैं। पुरुषों के अधिक तंबाकू सेवन से उनके स्पर्म की गुणवत्ता में भारी कमी आती है, जिसकी वजह से उन्हें संतान होने में दिक्कत होती है।
तंबाकू त्वचा पर डालता है बुरा प्रभाव
मैक्स अस्पताल के डर्मिटोलॉजिस्ट डॉ गौरांग कृष्णा ने बताया कि तंबाकू त्वचा पर बहुत बुरा असर डालती है। तंबाकू की वजह से त्वचा पर कम उम्र में झुर्रियां पडने लगती हैं। उन्होंने बताया कि तंबाकू त्वचा पर दो तरह से प्रभाव डालती है। पहली तो हवा में जाकर त्वचा की ऊपरी भाग को नुकसान पहुंचाती है। वहीं दूसरी तरफ  तंबाकू शरीर के अंदर जाकर त्वचा में खून का बहाव कम कर देती है, जिसकी वजह से त्वचा को जरूरी पोषण और ऑक्सीजन आदि नहीं मिल पाते हैं।
हड्डियों का कमजोर करता है तंबाकू
सफदरजंग स्पोर्ट्स इंज्यूरी सेंटर के अध्यक्ष डॉ दीपक चौधरी कहते हैं कि धूम्रपान की आदत का असर जोडों पर भी पडता है। तंबाकू में पाया जाने वाला निकोटीन शरीर में जहरीला प्रभाव छोडता है जिससे मांसपेशियों, जोडों और हड्डियों पर भी असर डालता है और हीलिंग की प्रक्रिया को धीमा कर देता है। निकोटीन हड्डियों का फ्रैक्चर भरने की प्रक्रियाएं एस्टोजन के प्रभाव को कम करता है और यह विटामिन सी और ई से मिलने वाले एंटी ऑक्सिडेंट तत्वों को निष्प्रभावी कर देता है। यही वजह है कि धूम्रपान करने वालों को कूल्हे के फ्रैक्चर का खतरा ज्यादा रहता है।



Monday, May 27, 2013

आईवीएफ तकनीक से अधिक उम्र में गर्भधारण पर लगे प्रतिबंध

आईवीएफ तकनीक से अधिक उम्र में गर्भधारण पर लगे प्रतिबंध
नई दिल्ली,  । उत्तर प्रदेश की 68 वर्षीय ग्रामीण महिला, एक साथ तीन बच्चों को जन्म देने की वजह से सुर्खियों में बनी हुई है। ऐसे में जहां एक तरफ आईवीएफ के द्वारा अधिक उम्र के बावजूद मां बन पाना एक वरदान साबित हुआ है वहीं इस उम्र में गर्भधारण करना कानूनी दिशा निर्देशों और होने वाले बच्चे के लिए कितना उचित है यह एक चिंता का विषय बना हुआ है। फार्टिस फेम अस्पताल की स्त्री रोग एवं बांझपन विशेषज्ञ डॉ़ ऋषिकेश पाई ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत के दौरान कहते हैं कि इस मामले में चिंताजनक विषय यह नहीं है कि अधिक आयु में गर्भ धारण कर पाने की संभावना कितनी अधिक है,बल्कि सोचने वाली बात यह है कि नैतिक रूप से यह कितना सही है। यह एक बहुत ही दुखद बात है कि किस प्रकार तकनीक के वरदान का दुरूपयोग करके इसको अभिशाप में बदला जा रहा है। इसलिए जरुरी है कि चिकित्सक और दंपति दोनों ही विज्ञान के द्वारा मिले विकल्पों का प्रयोग सहायता प्रजनन तकनीक के दिशा- निर्देशों के अनुसार कानूनी दायरे में रहते हुए ही करें,ताकि विज्ञान की यह देन वरदान की जगह अभिशाप न बन जाए।  सर गंगाराम अस्पताल की आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ आभा मजूमदार कहती हैं कि इस तकनीक के इस्तेमाल से कोई भी महिला किसी भी उम्र में अन्य महिला के अण्डदान के द्वारा गर्भ धारण कर सकती है। ज्यादातर देखा गया है कि 50 वर्ष की उम्र के बाद गर्भधारण करने वाली महिलाएं, होने वाले बच्चे पर पड़ने वाले दूरगामी परिणामों को ध्यान में रख कर यह निर्णय नहीं लेती। शारीरिक रूप से महिलाएं सिर्फ निश्चित उम्र तक ही गर्भवती हो सकती है। क्योंकि माता-पिता बनने का दायित्व सिर्फ बच्चे को जन्म देने तक ही पूरा नहीं होता,उन्हें होने वाले बच्चे के लिए सुखमय बचपन और स्वस्थ जीवन को भी सुनिश्चित करना होता है। जब माता पिता, खुद ही स्वस्थ और मजबूत नहीं होंगे उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे होने वाली संतान की सभी मूलभूत जरूरतों को पूरा कर एक अच्छा भविष्य दे पाएंगे।
50 वर्ष से ऊपर की महिलाओं के लिए आईवीएफ हो प्रतिबंधित
मौजूदा समय में 1000 से अधिक सदस्यों वाली भारतीय सहायता जन समूह के वरिष्ठ उपाध्यक्ष डॉ़ ऋशिकेश पाई का कहना है कि 50 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं के लिए आईवीएफ पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान के मुताबिक यह साबित हो चुका है कि अधिक उम्र में गर्भावस्था से मां और बच्चे दोनों को काफी खतरा होता है। बड़ी उम्र में गर्भधारण करने वाली महिलाओं में आमतौर पर मधुमेह, उच्च रक्तचाप होने का खतरा बढ़ जाता है़,जिसका सीधा असर गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास पर पड़ता है उन बच्चों में ज्यादातर आनुवंशिक दोष या मृत्यु होने की संभावना रहती है।
डा़ पाई कहते हैं कि जब कोई इस बात को लेकर सुनिश्चित ही नहीं है कि वह जिस नए जीवन को दुनिया में ला रहे हैं उसे गुणवत्ता पूर्ण जिंदगी दे भी सकते हैं या नहीं, ऐसे दंपतियों के लिए अधिक आयु में आईवीएफ द्वारा गर्भधारण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। डॉ पाई ने सरकार से इसपर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की मांग की है। उत्तर प्रदेश की इस महिला भतेरी के एक साथ तीन बच्चों के जन्म से एक और सबसे बड़ा खतरा सामने आया है। जैसा कि जन्म लेने वाले तीनों बच्चे मात्र 1.5 किलोग्राम के ही हैं। इतनी कमजोर स्थिति में इन बच्चों में संक्रमण एवं कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
प्रजनन तकनीक नियंत्रित करने का कोई कानून नहीं
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के उपाध्यक्ष डॉ के के अग्रवाल कहते हैं कि हालांकि सहायक प्र्रजनन तकनीक को नियंत्रित करने के लिए भारतीय कानून में कोई प्रावधान नहीं है,लेकिन इस तकनीक को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और नेशनल अकेडमी ऑफ मेडिकल साइंस के आधार क्षेत्र में रखा गया है। भारतीय असिस्टेड रिप्रोडक्शन व आईवीएफ भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा केवल दिशा निर्देश निर्धारित किए गए हैं। इसके लिए अभी तक कोई प्रभावी कानून नहीं है। डॉ अग्रवाल कहते हैं कि सहायक जनन तकनीक के लिए प्रस्तावित दिशा निर्देशों के अनुसार इस प्रक्रिया में गर्भधारण करने वाली महिला के गर्भ में केवल 2 अंडाणुओं को ही विस्थापित किया जा सकता है या फिर किसी जटिल परिस्थिति में अधिक से अधिक 3 अंडाणु,इससे अधिक करना कानूनी दिशा-निर्देशों के विपरीत एक अपराध है। ऐसा इसलिए क्योंकि जितने अधिक अंडाणु गर्भ में डाले जाएंगे उतने ही अधिक भ्रूण बनने की संभावना बढ़ जाती है। यदि एक से अधिक अंडाणु विस्थापित किए जाएंगे तो मल्टीपल प्रेगनेंसी की संभावना भी उतनी ही अधिक हो जाती है। इसलिए यह जरूरी है कि जब तक इस संदर्भ में कोई सख्त कानून भाव में नहीं आता है तब तक सभी आईवीएफ चिकित्सक इस तकनीक को प्रस्तावित दिश- निर्देशों के अनुसार ही प्रयोग करें और उत्तर प्रदेश की 68 वर्षीय महिला को तीन-तीन बच्चों के जन्म का जश्न मनाने का मौका देकर आने वाली मासूम जिंदगी को खतरे में न डालें।

चिकनपॉक्स से बचाव के लिए ‘एंटी रैट्रोवायरल थैरेपी’ ज़रूरी
नई दिल्ली। गर्मी बढने के साथ ही मार्च के महीने में होने वाले चिकन पॉक्स(चिकनगुनिया)की जटिलताओं को देखते हुए विशेषज्ञों ने बूढों एवं बच्चों को एंटी रैट्रो वॉरल थेरेपी लेने की सलाह दी है। इस संबंध में आगाह करते हुए  डॉ. के के अग्रवाल ने बताया कि प्राथमिक संक्रमण ‘वैरीसेला वायरस’ से होता है। जिससे जटिल समस्याएं हो सकती है, जिनमें टिश्यू इनफैक्शन, न्यूमोनिया, हेपेटाइटिस, एन्सीफैलाइटिस जैसी समस्याएं शामिल हैं , जो गर्भवती महिलाओं और वयस्कों में होती हैं। इसकी रोकथाम के लिए सभी वयस्कों और वृद्वों व बच्चों को बुखार की दवाईयां लेनी चाहिए। इससे बचने के तरीकों एवं उपचार के विषय में जानकारी देते हुए डा. अग्रवाल ने कहा कि सभी को नाखून कायदे से काटने चाहिए ताकि किसी समस्या या फिर कीटाणुओं से होने वाले संक्रमण से बचा जा सके । उन्होंने बताया कि खासकर बच्चों में बुखार के उपचार के लिए पैरासीटामॉल दी जानी चाहिए क्योंकि एस्प्रिन से रेम्ये सिंडोम का खतरा हो सकता है। सभी अधिक उम्र के बच्चो और वयस्कों को असाईलोविर दी जानी चाहिए। साथ ही उक्त थैरेपी उन लोगों को भी दी जानी चाहिए जो घर में रहते हों ओर वे क्रोनिक क्यूटेनियस या कार्डियोपल्मोनरी डिसआर्डर का शिकार हों । डा. अग्रवाल ने कहा कि असाइक्लोविर, वैरिसेला के लिए तभी सुरक्षित और प्रभावी है जब इसे चकत्ते निकलने के 24 घंटे के अंदर दिया जाए। इसके लिए डा. अग्रवाल ने टीकाकरण पर भी विशेष घ्यान देने की बात कही। उन्होंने कहा कि बिना इम्युनिटी प्रमाण के 12 से 15  महीने के सभी बच्चों को वैरिसेला टीकाकरण करवाना चाहिए। वैरिसेला वैक्सीन की दूसरी डोज नियमित तौर पर चार से छह सालों तक दी जानी चाहिए।। इस बिमारी से बचने के लिए सभी आशंकित बच्चो का उनके 13 वें जन्मदिन तक पूर्ण टीकाकरण करवाना अनिवार्य है।

सिर दर्द बन सकता है ब्रेन ट्‌यूमर
नई दिल्ली,। अक्सर ही मस्तिष्क के रोगों की शुरुआत सिर में असाधारण दर्द के साथ होती है। सुबह सोकर उठने के बाद यह सिरदर्द असहनीय रहता है और दिन गुजरने के साथ यह धीरे-धीरे कम होता है। पटपडगंज स्थित मैक्स हॉस्पिटल के न्यूरो सर्जन डॉ. अमिताभ गुप्ता का कहना है कि यही सिर दर्द ब्रेन ट्‌यूमर जैसी खतरनाक बिमारी का आगाज भी हो सकता है। जिसकी पहचान जितनी पहले हो जाए, इलाज उतना ही आसान हो जाता है।
डॉ. अमिताभ का कहना है कि ब्रेन ट्‌यूमर के लक्षण सीधे उससे संबंधित होते हैं जहां दिमाग के अंदर ट्‌यूमर होता है। उदाहरण के लिए मस्तिष्क के पीछे ट्‌यूमर के कारण दृष्टि संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। प्राय: ब्रेन ट्‌यूमर का निदान करना थोडा मुश्किल होता है क्योंकि इसमें पाए जाने वाले लक्षण किसी अन्य समस्या के भी संकेत हो सकते हैं। बोलते समय अटकना, दवाइयों, नशीले  पदार्थों या शराब का सेवन करने के कारण भी हो सकता है। जब यह लक्षण बहुत तीव्रता के साथ उत्पन्न होने लगते हैं तो यह ब्रेन ट्‌यूमर का कारण हो सकते हैं। डॉ. अमिताभ गुप्ता के अनुसार इंडोस्कोपिक सर्जरी में सफलता की दर बहुत ऊंची है और यही कारण है कि दुनिया भर में मस्तिष्क की सर्जरी के लिए इस सुरक्षित तरीके को अपनाया जा रहा है।


उचित आराम एवं प्राणायाम से व्यक्ति जा सकता है बुढापे से युवावस्था की ओर
नई दिल्ली। हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और आईएमए के निर्वाचित उपाध्यक्ष डॉ. के के अग्रवाल ने कहा कि ऐसा संभव है कि हमारी उम्र बढने पर भी हमारी सोच जवां रह सकती है। इसकी संभावना अधिक है।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि मानव का शरीर सिर्फ एक ढांचा नहीं है, बल्कि इसमें एक मानसिक स्तर, आध्यात्मिक और आत्मा होती है। उम्र बढने के साथ-साथ सिर्फ मानुष्य का शरीर बूढा होता है, लेकिन उसके शरीर के अन्य हिस्से उम्र के साथ परिपक्व होते जाते हैं। एक व्यक्ति उम्र के बढने के साथ ही अधिक विनम्र होता जाता है। मनुष्य के शरीर का अंत बुढापे के तौर पर नहीं, बल्कि युवा होने के तौर पर होता है। उन्होंने आगे कहा कि व्यक्ति की जैविक और आध्यात्मिक उम्र देखनी चाहिए न कि उसकी शारीरिक उम्र। वर्तमान समय के मुताबिक हो सकता है कि आप 70 साल की उम्र के हों, लेकिन जैविक रूप से हो सकता है कि आपकी आयु 60 साल की ही हो। डा. अग्रवाल ने कहा कि चिकित्सा विज्ञान में आज अधिकतर दवाएं जैविक उम्र के हिसाब से ही दी जाती हैं, न कि काल के उम्र के अनुरूप।
हमारे वेदों में भी यही सीख दी गई है कि हम कैसे युवा रह सकते हैं। आज के युग की महामारी आइरन, कैल्शियम और विटामिन डी की कमी है जिनका संबध ऑस्टियोपोरोसिस से है। इसके साथ ही कार्बोहाइडेट संबधी हृदय से जुडी बीमारियां समाज में नहीं घुस सकतीं बशर्ते हम परंपरागत खाने के तरीके जैसे हफ्ते में एक बार गुड-चना, माघ माह में सूर्य की पूजा और हफ्ते में एक बार ही कार्बोहाइडेट को ले। ये ऐसे रीति-रिवाज हैं जिनको भारत के हर एक नागरिक को अपनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। डॉ. के के अग्रवाल ने कहा कि आराम, प्राणायाम और ध्यान को अपनाकर भी व्यक्ति बुढापे से युवावस्था की ओर अग्रसर होता है। दिन के समय पैरासि पैथेटिक मोड पर खडे रहकर आप अलग अनुभव कर सकते हैं।

आंखों में छुपी हैं हार्टअटैक की मिस्ट्री
नई दिल्ली। आंखों से न सिर्फ हमें खूबसूरत प्रकृति दृश्यों को ही दिखाते हैं बल्कि यह किसी का हाल-ए-दिल भी हमें बया करती हैं। आपका दिल कितना अच्छा काम कर रहा है। कब यह आपको झटका देगा, इन बातों का जवाब भी आंखें देती हैं। आपकी आंखें आपके रक्तचाप और मधुमेह की स्थिति का सही आंकलन कर आपको होने वाले हृदयघात के बारे में जानकारी देती हैं। आपका कार्डियोलॉजिस्ट यदि आपकी आंखों की पड़ताल किसी आई सर्जन की तरह करने लगें तो आप हैरान मत होइऐगा। वह आपके हाल-ए-दिल का मुआयना कर यह बताने में सक्षम होंगी कि आपको कभी हार्ट अटैक होगा या नहीं। ऑपथेलोस्कोप आंखों के भीतर झांककर, बताती हैं दिल का हाल। आईसेवन अस्पताल के निदेशक व वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. संजय चौधरी कहते हैं कि हालांकि बीमारियों के बारे में जानकारियां हासिल करने के लिए आंखों में झांकने की बात कोई नई नहीं है। पहले भी चिकित्सक बीमारियों की उपस्थिति का पता लगाने के लिए आंखों के अंदर झांकते रहे हैं। उन्होंने बताया कि ऑपथेलोस्कोप उपकरण की मदद से आंखों के भीतर झांककर रक्तचाप, हृदय संबंधी गडबडियां, मधुमेह और ब्रेन स्टोक जैसी बीमारियों की उपस्थिति के बारे में पहले ही पता लगाया जा सकता है। डॉ संजय चौधरी कहते हैं कि आंख के रेटाइनल आर्टियोल्स एवं रक्त वाहिकाओं के बदलते आकार में परिवर्तन हृदय में होने वाली किसी गडबडियों की ओर इशारा करता है।एक अध्ययन से सामने आया कि आंख और हृदय का संबंध का खुलासा इंडियन हार्ट फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. आरएन कालरा ने आंख और हृदय के बीच के संबंधों पर हुए शोध के हवाले से बताया कि वाशिंगटन और मिशिगन विवि के एक अध्ययन में यह साबित हुआ है कि दिल के तार आंखों से भी जुडे हैं। डॉ कालरा ने बताया कि रक्त वाहिकाएं के सिकूडन व फैलने के अलावा ऑप्टिक नर्व के बेस में होने वाली सूजन कार्डियोलॉजिस्ट को हृदय की गडबडियों के बारे में संकेत दे देता है।