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Tuesday, July 28, 2015

स्कूल में जाने का मन करता हैं...

कल दोपहर के 12.00 बजे अपने स्कूल के सामने से गुजरा तो एक एक एहसास अलग था।.. क्योकि यह एक पहला समय था जब लंबे अंतराल के बाद स्कूल की छुट्टी के समय स्कूल के सामने से गुजरा था... वही पुरानी बात थी रोड़ पर ट्रैफिक जाम था। सुबह की शिफ्ट की लड़किया छुट्टी होने के बाद अपने अपने घर जा रही थी। लड़के लड़कियों का स्कूल से निकलने का इँतजार कर रहे थे। स्कूल के बाहर जलजीरे वाला और कोल्डडि्क वाला तो नही था, लेकिन याद वहीं आ रही थी। बच्चों को बाहर निकलते देख स्कूल के अंदर जाने की इच्छा हुई ,लेकिन काम से कही जाना था तो नहीं जा पाया, लेकिन जहां जा रहा था वहां तक पहुंचने तक बाइक चलाते समय स्कूल के पुरानी यादें मन में चल रही थी।
वो यादे कुछ ऐसी थी...
... लड़कियों की छुट्टी होने से पहले स्कूल पहुंच जाना और क्लास में पहली डेस्क हथियाने के लिए रोज नए हथकंडे अपनाना
---- जल्दी पहुंचकर डेस्क पर बस्ता रखकर डेस्क के फट्टे का बल्ला निकालना और फिर खेल के मैदान की ओर विकेट घेरने के बाद खेलने का दावा करना
---पीटीआई के सीटी बजाने तक और लाइन लग जाने तक आखिरी बोल तक खेलना। फिर चुपचाप फ्ट्टा (बल्ला) रेत में छिपाकर रख देना और फिर कड़ी घूप में दोपहर एक बजे प्रार्थना में खड़े होना।
--- लाइन में सबसे आगे लगना और फिर क्लास में जल्दी जाने के लिए स्कूल के मंच पर जाकर हाजिरी के लिए गिनती बोलना (इससे दो लाभ होते थे,एक तो टीचर अच्छा बच्चा मानते थे और दूसरा धूप से जल्दी निजात मिल जाती थी )
--- क्लास में पहुंचकर घर से ले जाया हुई बर्फ की बोतल निकाल कर पानी पीना-- क्योंकि सब बच्चे आने के बाद सबको पानी ठंडा पिलाना पड़ता था स्कूल में पानी नहीं आता था.
- दो साल तक तो बिना पंखे औऱ बिना लाइट वाली क्लास में बैठना
--फिर लंच का इंतजार करना और उस 15 मिनट में 3 ओवर के मैच को पूरा
करना
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मेरा प्यारा राजकीय सर्वोदय बाल विद्यालय - वेस्ट विनोद नगर