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Sunday, March 26, 2017

सिफारिश नहीं सर्वे के आधार पर मिलेगा टिकट

-देर रात प्रदेश भाजपा आफिस पहुंचे अमित शाह

- कोर ग्रुप की बैठक भी हुई, नहीं मिलेगा मौजूदा पार्षद को टिकट

दिल्ली नगर निगम चुनाव को भाजपा ने नाक का सवाल बना लिया है। यही वजह है कि पंच परमेश्वर सम्मेलन के सफल आयोजन के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह प्रदेश भाजपा आफिस पहुंचकर प्रदेश पदाधिकारियों और कोर ग्रुप की बैठक ली। सूत्रों ने बताया कि अमित शाह ने साफ कर दिया है कि मौजूदा पार्षदों के टिकट काटने के फैसले पर भाजपा बैकफुट पर न आकर कायम रहेगी। साथ ही किसी सिफारिश के आधार पर किसी भी व्यक्ति को टिकट नही दिया जाएगा। राष्ट्रीय भाजपा द्वारा एक निष्पक्ष सर्वे चल रहा है, जिसके आधार पर ही टिकटों का बंटवारा होगा।

सूत्रों ने बताया राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की यह बैठक पहले से प्लानिंग का हिस्सा नहीं थी। देर शाम को सभी पदाधिकारियों की बैठक की सूचना दी गई। और कुछ ही देर बाद सभी पदाधिकारी प्रदेश कार्यलय पंत मार्ग पहुंच गए। इसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी पहुंच गए। जिसके बाद केन्द्रीय नेताओं और अमित शाह की अगुवाई में प्रदेश के पदाधिकारी और सांसदो की बैठक हुई। जिसमे  उन्होंने आने वाले वीरवार यानि 30 मार्च तक हर मंडल की बैठक कर ली। उन्होंने प्रदेश नेतृत्व को आदेश दिए कि वह काम बांटकर लोकसभा अनुसार सभी मंडलों की बैठक कर ले। साथ ही ध्यान रखें की वह कार्यकर्ताओं को भाषण न देकर उनकी बात सुने और समझे। बैठक में प्रदेश पदाधिकारियों के आलावा केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण, अनिल जैन, जितेन्द्र सिंह मौजूद थे।

सूत्रों ने बताया कि भाजपा को 9 अप्रैल को होने वाले राजौरी गार्डन विधानसभा चुनाव पर भी जमकर मेहनत करने के निर्देश आलाकमान ने दिए है। भाजपा का मानना है किअगर भाजपा इस सीट को जीतती है तो उसका फायदा आने वाले निगम चुनाव में मिलेगा। 

साभार : पंजाब केसरी


Tuesday, December 27, 2016

हुजुर आते-आते बहुत देर कर दी








नई दिल्ली । बहुत देर से दर पे आँखें लगी थीं,हुज़ूर आते-आते बहुत देर कर दी, मसीहा मेरे तूने
बीमार-ए-ग़म की दवा लाते-लाते बहुत देर कर दी। मशहूर हिन्दी फिल्म तवायफ के गाने के यह बोल दिल्ली भाजपा के साल के हिसाब पूरी तरह सटीक है। जी हां इस पूरे गाने दिल्ली भाजपा के पूरे साल का हिसाब चंदे सैंकड़ो में लगाया जा सकता है। क्योंकि दिल्ली भाजपा के लिए वर्ष 2016 आत्महत्या का साल रहा यां यू कह लिजिए कि अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाला साल रहा। हालांकि पार्टी के का दूसरा धड़ा मनोज तिवारी से कई उम्मीदें करके भी बैठा है । इस धड़े का मानना है कि तिवारी के आने से भाजपा को एक नई ऊर्जा मिलेगी और अगामी चुनाव में पार्टी को  जीत भी मिलेगी। क्योंकि पार्टी को पूर्वांचली कार्ड सफल होते दिखाई दे रहा है। मनोज तिवारी द्वारा की जा रही जनसभाओं में आने वाली भीड़ भी बढ़ गई है। पहले प्रदेश अध्यक्षों की भीड़ के लिए भाजपा को एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता था, लेकिन पार्टी को लोगों का अपार जनसमर्थन मिल रहा है। 

खुद भाजपाईयों का मानना है कि  30 नवम्बर 2016 को दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष सतीश उपाध्याय की जगह मनोज तिवारी को बनाना देर से लिया गया फैसला साबित हो सकता है । क्योंकि इस फैसले में  पहले ही इतनी देर हो चुकी थी कि भाजपा दिल्ली में मई माह में हुए उप-चुनाव में दिल्ली विधानसभा चुनाव 2015 की तरह निगम में भी तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा। याद दिला दें कि मई में तीनों निगम की 13 सीटों पर उप-चुनाव हुआ था। जिसमें भाजपा को केवल 3 सीटों से संतोष करना पड़ा था। खास बात यह रही कि दिल्ली में तीसरे नम्बर की पार्टी गिनी जाने वाली कांग्रेस भी दूसरे नम्बर पर आकर खड़ी हो गई। सत्तारुढ आम आदमी पार्टी पहले स्थान पर वर्चस्व बनाने में कामयाब रही। हालांकि उप चुनाव नतीजों में भाजपा के लिए राहत की खबर वोट प्रतिशत रहा। तीन सीटें तीने के बाद भी भाजपा 34 फीसदी वोट लेकर भाजपा वोट प्रतिशत में सबसे बड़ी पार्टी बनी है। यहां आम आदमी पार्टी को 29.93 वोट प्रतिशत वोट मिले थे। साथ ही कांग्रेस ने 24.87 वोट प्रतिशत के साथ जोर दार वापसी की थी। 
  1. - साल के आखिरी में अध्यक्ष बदलने का लिया फैसला
  2. - अगले साल निगम चुनाव में होगी मनोज तिवारी की परीक्षा
  3. - उप चुनाव में भी तीन में सिमट गई थी भाजपा


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जब तक फैसला हुआ तो बिखर चुकी थी पार्टी 
भाजपा आलाकमान ने 30 नम्बर को जब मनोज तिवारी को अध्यक्ष बनाकर भले ही पूर्वांचली राजनीति को दिल्ली में शिखर पर लाकर खड़ा कर दिया। लेकिन तिवारी के अध्यक्ष बनाने तक दिल्ली भाजपा पूरी तरह बिखर चुकी थी। पूर्व अध्यक्ष सतीश उपाध्याय को वर्ष 2015 के जनवरी से बदलने की चर्चा थी। जिससे कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों में यह संदेश था कि अब जो भी करके दिखाना है वह नए अध्यक्ष के सामने करना है। इतने में कार्यकर्ता नए अध्यक्ष की रेस में चल रहे नेताओं की जी हुजुरी में लग गए। और दिल्ली में भाजपा काम ठप्प पड़ गया। न तो निगम के नेता सतीश उपाध्याय की सुनने को तैयार थे और न ही प्रदेश पदाधिकारी। जिसका खामियाजा यह हुआ निगम के उप चुनाव में पार्टी की गुटबाजी के नतीजे सामने आ गए। 

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दिल्ली सरकार को बेनकाब करने में कामयाब हुए उपाध्याय

भले ही पार्टी में अकेलेपन की मार झेल रहे सतीश उपाध्याय को भाजपा ने अचानक हटा दिया। लेकिन बतौर अध्यक्ष रहते हुए दिल्ली भाजपा  दिल्ली की केजरीवाल सरकार को घेरने में सतीश उपाध्याय कामयाब रहे। दिल्ली जल बोर्ड का टैंकर घोटाला हो, या अनाधिकृत कॉलोनियों का मुद्दा हो। उपाध्याय सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने में कामयाब रहे। वह धरने प्रदर्शनों से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब रहे। हालांकि अपने अंहकार की वजह से उन्हें पार्टी के बढ़े नेताओं की गुस्से का भी शिकार होना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपनी बॉडी लैंग्वैज नहीं बदली। यही वजह रही कि आलाकमान ने उन्हें ऐसे समय पर हटाए जब सतीश उपाध्याय के अध्यक्ष बने रहने की चर्चाओं ने जोर पकड लिया। बतौर भाजपा विधायक विजेन्द्र गुप्ता भी सदन में सरकार की नीतियों के खिलाफ विपक्ष की उपस्थिती दर्ज कराता रहा। गुप्ता भी अपने नौकरशाही में अपने संबधों की वजह से दिल्ली सरकार को घेरने में कामयाब रहे। उन्होंने विधानसभा में टैंकर घोटाले को उठाया, जिसकी वजह से दिल्ली सरकार को टैंकर घोटाले की रिपोर्ट विधानसभा में पेश करनी पड़ी। जिसमें एसीबी में भी मामला दर्ज हुआ। 


हाईटैक नहीं हुई भाजपा
भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ट्वीटर पर सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले पहले राजनेता हो, और वह तकनीक को राजनीति से जोड़कर लाभ लेने में पीछे नहीं रहते। लेकिन दिल्ली भाजपा तकनीक के तौर पर राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से तीसरी पार्टी बन गई है। एक ओर सत्तारुढ आम आदमी पार्टी (आप) सोशल मीडिया और तकनीकी टैक्टिस से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं, लेकिन दिल्ली भाजपा के कई पदाधिकारी ऐसे हैं जो सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं है। तीसरे नम्बर की पार्टी कही जाने वाली कांग्रेस ने भी लाइव प्रेसवार्ताओं का प्रसारण शुरू कर दिया है, लेकिन भाजपा ने अभी तक इसके बारे में सोचा तक नहीं है। 

2017 होगा साबित करने वाला साल
केन्द्रीय स्तर के साथ-साथ दिल्ली भाजपा के लिए वर्ष 2017 अपने आप को साबित करने का साल रहेगा। बतौर अध्यक्ष बनने के बाद कलाकर मनोज तिवारी को टीम को साथ लेकर पूरी ऊर्जा को पार्टी के भलाई में लगाना होगा, ताकि वह निगम के होने वाले चुनाव में सत्ता को बरकरार रख सके। 



नए संगठन महामंत्री से मिल रही पार्टी को मजबूती
भाजपा के लिए वर्ष 2016 बदलाव भरा भी रहा। एक ओर साल के आखिर में पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष को बदला तो इससे पहले पार्टी में आए पूर्व वर्ष 2015 संगठन महामंत्री विजय शर्मा को बदलते हुए पार्टी ने दक्षिणी भारत के संघ कार्यकर्ता सिद्धार्थन को भी प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी सौंप दी। जिससे पार्टी को एक नई दिशा भी मिलती दिखाई दे रही है। सिद्धार्थन का पूरी दिल्ली में अपने संपर्क है, क्योंकि बतौर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस)प्रचारक वह सभी विभागों में काम कर चुके हैं। उन्हें हर जिले और मंडल व नगर के समर्पित कार्यकर्ताओं की पहचान है। जिससे संगठन को खड़ा करने में मजबूती मिलने के आसार है। उनके इस प्रभाव से ही पार्टी में गुटबाजी भी काफी होती दिखाई दी है।
समर्पण को मिला ईनाम
जिलाध्यक्षों की नियुक्ति भी भाजपा ने साल के आखिर में की। जिससे पार्टी में अपनी आस्था रखने वाले कार्यकर्ताओं को पार्टी ने जिलाध्यक्ष नियुक्त करके उनके समर्पण का ईनाम दे दिया। इसमें ऐसे नए लोगों को जगह दी गई जो कि पार्टी के लिए समर्पित भाव से काम करते रहें। पार्टी ने गुटबाजी को खत्म करते हुए पेराशूट उम्मीदवारी को खत्म करने का फैसला लिया। जिससे केवल उन्ही लोगों को जिम्मेदारी दी जाएगी जो केवल काम करके दिखाएंगे। माना जा रहा है कि प्रदेश टीम में होने वाली नियुक्ति में भी इसी नियम का असर दिखाई देगा। वहीं वर्ष 2017 में होने वाले निगम चुनाव में भी इसी नियम को फॉलो किए जाने की पूरी संभावना है।
- निहाल सिंह, साभार : पंजाब केसरी


Tuesday, July 5, 2016

अब चैन की लंबी-लंबी सांस ले उपाध्याय

आज का दिन दिल्ली भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के लिए चैन की सांस लेने का है। अभी आपकों समझ नहीं आया होगा। लेकिन मैं आपको समझाने की कोशिश करता हू। समझ आए तो नीचे प्रतिक्रिया बॉक्स में कमैंट और शेयर के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं।
आईए अब में आपको समझाता हूं कि आज से उपाध्याय क्यों चैन की सांस ले सकते है। और यह चैन की सांस 10 अशोका रोड़ से होते हुए 14 पंडित मार्ग तक पहुंच रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले तीन-चार माह से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हुए विजय गोयल अब केन्द्र में आज राज्य मंत्री बन गए है। विजय गोयल की सक्रियता से न केवल प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी के पहिए ढीले हो गए थे बल्कि पूरा डी4 चिंता में पड़ गया था। आए दिन विजय गोयल की गतिविधियों को देख दिल्ली भाजपा सत्ता रूढ केजरीवाल से जितनी डरती नहीं थी, जितना डर अपने ही भाजपा सांसद विजय गोयल से भाजपा को लग रहा था। प्रदेश अध्यक्ष और डी-4 को चिंता थी,अगर विजय गोयल प्रदेश अध्यक्ष बन गए तो उनका क्या होगा। जिसकी वजह डी4 विजय गोयल को गरियाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। खैर अब तो विजय गोयल केन्द्र की राजनीति में पहुंच गए हैं तो डी-4 की मुश्किलें कम हो गई है।
लेकिन मुश्किलें डी-4 की कम हुई है भाजपा की नहीं। दरअसल पिछले दो से तीन सालों में कांग्रेस मुक्त भारत के नारे ने खूब जोर पकड़ा। जिसकी शुरूआत दिल्ली से दिखाई दी। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव हुए और 15 साल से सत्ता में बैठी कांग्रेस के केवल 8 विधायक जीतकर आए। भाजपा 32 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई लेकिन 28 सीटें जीतकर उस समय नौसिखिया कही जाने वाली आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने सरकार बना ली। खैर उसके बाद जो हुआ वह सबकों पता है। कांग्रेस की आठ सीटें देखकर कांग्रेस मुक्त भारत के नारे ने और जोर पकड़ा तो वर्ष 2014 के आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने लोगों के दिलों पर जादू करके न केवल पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई बल्कि पिछले कई दशकों के रिकार्ड को भी तोड़ दिया। जिसके बाद भाजपाई कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को और जोर से बोलने लगे। इस नारे को बोलते समय भाजपाई अब कमर से नीचें का भी जोर लगाते थे। खैर उसी कांग्रेस मुक्त नारे के बीच दिल्ली से भाजपा मुक्त दिल्ली की आवाज आई। हुआ यूं कि वर्ष 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने न केवल कांग्रेस मुक्त दिल्ली की बल्कि 67 सीटें जीतकर और तीन सीटें भाजपा को दान में देकर भाजपा मुक्त दिल्ली के अघोषित अभियान की शुरूआत कर दी। जिसका नतीजा वर्ष 2016 के मई माह में हुए 13 सीटों के निगम उप चुनाव में दिखाई दिया। विधानसभा में तीन सीटें केजरीवाल से दान में लेकर आई भाजपा फिर तीन सीटें लेने में कामयाब रही। और जिस दिल्ली से कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान की शुरूआत हुई उसी दिल्ली से भाजपा मुक्त दिल्ली की शुरूआत हो गई। जिसकी प्रमुख वजह केन्द्रीय भाजपा आलाकमान रहा। और आगे भी ऐसा चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं होगा कि दिल्ली मुक्त भाजपा हो जाए। क्योंकि दिल्ली में भाजपा की राजनीति खत्म हो रही है। एक तो दिल्ली में दो सांसद ऐसे हैं जो दिल्ली से जबरदस्ती सांसद बनें हुए है। जिसमें पहले रामराज (उदितराज) (जी हां उदित राज नहीं रामराज, यह वह जो कभी राम का विरोध करते हुए अपने नाम के आगे से राम शब्द  को हटा लिया था और उदित लगा दिया था) (एक वरिष्ठ पत्रकार के बातचीत के आधार पर) दूसरे सांसद जो नाचने गाने के लिए जाने जाते है। लोकसभा चुनाव जीते तो उन्होंने साफ कार्यकर्ताओं से कह दिया कुछ भी हो जाए वह आगे से दिल्ली से लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेगे।  खैर बहुत ज्ञान हो गया। अब असली बात यह है दिल्ली भाजपा का क्या होगा। तो मैं बेजानदारू वाले की तरह कह सकता हूं कि निगम के फरवरी में होने वाली चुनाव में भाजपा कमाल करेगी, और तीनों निगम में एक-एक-एक सीट कर अपने तीन के आंकड़े को दोहराएगी। इसकी प्रमुख वजह सबसे पहले प्रदेश ईकाई होगी और दूसरी राष्ट्रीय ईकाई।  हालांकि माना जा रहा है कि राष्ट्रीय ईकाई के लिए यह लड्डू बांटने का अवसर होगा। क्योंकि सूत्र बताते है कि केन्द्रीय आलाकमान दिल्ली भाजपा ईकाई से विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर खुश नहीं है। जिसमें प्रमुख वजह दिल्ली की गुटबाजी थी। अगर दिल्ली भाजपा खत्म होती है तो केन्द्रीय भाजपा के लिए यह खुशी की बात होगी।
आगे की बताता हू। दरअसल प्रदेश अध्यक्ष को बदलने को लेकर काफी दिनों से चर्चा चल रही है । डेढ साल से अब बदला अब बदला, लेकिन अभी तक नहीं बदला वाला हाल है। जिसका असर यह है कि जिलों के अध्यक्ष से लेकर मंडल का कोई कार्यकर्ता प्रदेश आलाकमान की सुनने को राजी नहीं है। जिसकी प्रमुख वजह भाजपा का आधार घट रहा है। पहले अगर उपाध्याय को दोबारा के कार्यकाल के लिए घोषित कर दिया होता तो बात इतनी न बिगडती। लेकिन जमीनी हकीकत की मानें तो भाजपा का हर कार्यकर्ता और नेता प्रदेश अध्यक्ष बदलने की मांग कर रहा है। बस यह है कि वह अपनी बात कह नहीं पा रहा है। मुझे खुद दिन में 10-20 फोन कॉल आते हैं जिसमें कार्यकर्ता बदलने की बात पूछते है। इसलिए अब रायता इतना फैल चुका है कि बिना बदले बात नहीं बनेगी।  


नोट- यह व्यक्तिगत विचार है, इसका किसी संस्थान या व्यक्ति से कोई संबध नहीं है...