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Tuesday, August 30, 2016

जब पत्रकारों को मिली शबाशी के बदले मौत

भारत में पत्रकारिता करना नहीं है आसान, ये दो बीट्स हैं सबसे खतरनाक
भारत उन पत्रकारों की मदद करने और उनकी रक्षा करने में विफल रहा है जो हिंसक धमकियों या फिर अपने काम के प्रति हमलों का सामना कर रहे हैं। ये कहना है पत्रकारों की सुरक्षा पर नजर रखने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था का, जिसने सोमवार को अपनी एक रिपोर्ट जारी की है।
न्यूयार्क की संस्था ‘द कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (सीपीजे) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में दावा किया है कि उसने 1992 से भारत में पत्रकारों की हत्याओं के 27 मामलों का अध्ययन किया और उनमें से एक में भी किसी को सजा नहीं हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन 27 पत्रकारों में से 50% से ज्यादा पत्रकार भ्रष्टाचार संबंधी मामलों पर खबरें करते थे।
42 पन्नों की इस विशेष रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में रिपोर्टरों को काम के दौरान पूरी सुरक्षा अभी भी नहीं मिल पाती है। सीपीजे ने अपनी रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और राजनीति को दो ‘सबसे खतरनाक बीट’ बताया गया है।
सीपीजे ने कहा कि पिछले 10 साल में उसे सिर्फ एक ही ऐसा मामला मिला जिसमें एक पत्रकार की हत्या के मामले में एक संदिग्ध का अभियोजन हुआ और उस पर दर्ज हुए आरोप सिद्ध किए जा सके, लेकिन बाद में उसे भी अपील पर रिहा कर दिया गया। दूरदराज और ग्रामीण इलाकों में रिपोटिर्ंग करने वालों पर हिंसा और धमकियों का ज्यादा जोखिम होता है।
किसी पत्रकार पर हमला होने या हत्या होने पर मीडिया क्षेत्र और समाज में अकसर बहुत रोष नहीं जताया जाता जो कि खेद का विषय है। समिति ने अपने नतीजों पर पहुंचने तथा सुझाव के लिए तीन पत्रकारों जगेन्द्र सिंह, उमेश राजपूत और अक्षय सिंह की मौतों के मामलों का अध्ययन किया जिसकी हाल ही में हत्या कर दी गई थी।
जगेन्द्र सिंह की उत्तर प्रदेश में हत्या कर दी गई थी जबकि उमेश राजपूत की छत्तीसगढ़ में हत्या कर दी गई थी वहीं अक्षय सिंह की मौत मध्य प्रदेश में हुई थी।
संसद पत्रकारों के लिए एक देशव्यापी सुरक्षा कानून बनाए रिपोर्ट में इस बात की भी पुरजोर वकालत की गई है।

Sunday, July 10, 2016

दिल्ली केंदित मीडिया होना विकास के लिए खतरा...

अब कहा है रवीश कुमार

पत्रकारिता में दाखिला लिया था, उस दौरान दिल्ली में यमुना का जल स्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया था। तो पूरे दिन सभी समाचार चैनलों पर दिल्ली की यमुना की तस्वीर यमुना में बोट लेकर पत्रकारों द्वारा जल का बहाव दिखाने की कोशिश, यमुना में बहकर आ रही सब्जियां जैसी खबरे खूब दिखाई जा रही थी। चूंकि मैं पत्रकारिता का छात्र था तो उस दौरान कई दूसरे क्लासमेट अन्य राज्यों से पढ़ने आए थे। उस समय में खबरों का आकलन करने की सोच धीरे-धीरे विकसित हो रही थी। जो दोस्त बाहर से पढ़ने आए थे वह इतने घबराएं हुए नहीं थे, जितने उनके माता पिता घबराए हुए थे। रोजाना दोस्तों को हर तीसरे चौथे घंटे पर फोन आता था कि बाढ़ का पानी कही तुम्हारे घर के पास तो नहीं पहुंचा, अगर ऐसा कुछ हैं तो वापस घर आ जाओं जब बाढ़ चली जाएगी तो वापस चले जाना। मेरे दोस्त कभी हंसते हुए तो कभी गंभीरता से अपने अभिभावकों को विश्वास दिलाते कि उन्हें कुछ नहीं होगा। उस समय समझ आया कि एक माता पिता के लिए अपने बच्चे को दूसरे राज्य में पढाई के लिए भेजना कितना चिंता करने वाला काम होता है। खैर लेकिन बारिश बंद हुए बाढ़ नहीं आई। हा शास्त्री पार्क के कुछ मकानों पर घुटने भर का पानी आ गया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ कि पूरी दिल्ली बाढ़ से ठप्प हो गई है। मुश्किल से मुश्किल 30-40 हजार अंदाजन लोग इस बाढ से प्रभावित हुए होंगे।
दूसरी घटना पत्रकारिता की पढाई पूरी करने के बाद वर्ष 2013 में देखने को मिली उस समय मैं भी सक्रिय रूप से पत्रकारिता में आ गया था। हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजैंसी में काम कर रहा था, और दूसरी ओर मेरा नवोदय टाइम्स की लांचिंग से पहले ज्वाइनिंग की तैयारी कर रहा था। उस दौरान भी दिल्ली में बाढ़ आई। नवोदय टाइम्स के लिए मैने बाढ़ प्रभावितों से बातचीत करके खूब खबरें की। उस समय चूंकि ज्वाइनिंग नहीं हुई थी तो खबरों पर नाम नहीं छप रहा था, लेकिन कुछ दिनों ज्वाइनिंग की प्रक्रिया भी पूरी हो गई और खबरों पर नाम  भी छपने लगा। चलिए मान लिया की मैंने दिल्ली के अखबार होने के नातें दिल्ली की घटना की जानकारी अपने समाचार पत्र के लिए एकत्रित की। लेकिन क्या राष्ट्रीय चैनलों की इतनी जिम्मेदारी नहीं बनती है कि वह राष्ट्रीय खबरों को प्रमुखता से दिखाएं। कल रात को समाचार देख रहा था, जिसमें पूर्वोत्तर के असम गुवाहाटी में आई बाढ़ की खबर को रात के बुलेटिन में करीब 30 सैंकेड की जगह मिली।  मैं हैरान तो नहीं था लेकिन मन में चिंता जरूर हुई की अब हमारा मीडिया कितना दिल्ली केंद्रित हो गया है। चाहे चुनाव हो या फिर सामाजिक समस्या दिल्ली की ज्यादा कवर की जाती है। अगर यही खबरें अगर पूर्वोत्तर और दक्षित भारत से आएं तो उन्हे रात के बुलेटिन में जगह दी जाती है।  मैं चिंतित था कि समाज को आईने दिखाने वाले समाचार चैनलों के लिए पूर्वोत्तर या दक्षिण भारत की खबरों को कितना गंभीरता से लेते है। क्योंकि वहां चैनल वालों को बाजारी लाभ नहीं मिलता। जो मीडिया चैनल दिल्ली के यमुना के थोड़े से पानी बढ़ने को लेकर अपनी छाती पीटता है वह एक लाख से ज्यादा लोगों को प्रभावित करने वाली असम के गुवहाटी की बाढ़ को केवल औपचारिकता मात्र की खबरों में जगह देता है। दिल्ली से कोई भी रिपोर्टर वहां कवर करने नहीं जाता है। अगर दिल्ली में बाढ़ आ जाती है तो खुद एनडीटीवी के तथाकथित भेड़ चाल से अलग चलने वाले रवीश कुमार भी नांव में बोट लेकर हाल दिखाना शुरू कर देते है। लेकिन गुवहाटी की बाढ़ में यह नजर नहीं आए। जहां पर एक एक मंजिल से ऊपर पानी घरों में घुस गया है। लोगों के लिए खाने के लाले पड़े है।  मेरा मानना है कि ऐसा करना समाचार चैनलों के लिए ऐसा करना देश के विकास के घातक है। क्योंकि जब देश के सीमावर्ती राज्यों की जानकारी राष्ट्रीय मीडिया में नहीं आएगी,तो उससे उन राज्यों में रहने वाले लोगों में हीन भावना आएगी।